अपनी बीमारी के इलाज के लिए लंदन गए इरफान खान के खत के चलते वो एक बार फिर से चर्चा में आ गए हैं। न्यूरोएंडोक्राइन कैंसर से जूझ रहे इरफान खान बीमारी के दौरान भी काम करते रहने की उनकी इच्छा ने एक 'कारवां' शुरू किया है।
इरफान की आने वाली फिल्म का नाम कारवां है, जो कि 3 अगस्त को रिलीज होगी। इरफान ने ये खत वरिष्ठ फिल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज को भेजा है। उन्होंने इरफान का ये इमोशनल खत अपने ब्लॉग चवन्नी चैप पर शेयर किया है।
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अजय ने अपने ब्लॉग में लिखा, 'कुछ महीने पहले अचानक मुझे पता चला कि मैं न्यूरोएन्डोक्राइन कैंसर से ग्रस्त हूं। यह शब्द मैंने पहली बार सुना था। जब मैंने इसके बारे में सर्च की तो पाया कि इस पर ज्यादा शोध नहीं हुए हैं। इसके बारे में ज्यादा जानकारी भी मौजूद नहीं थी। यह एक दुर्लभ शारीरिक अवस्था का नाम है और इस वजह से इसके उपचार की अनिश्चितता ज्यादा है।
अभी तक मैं तेज रफ्तार वाली ट्रेन में सफर कर रहा था। मेरे कुछ सपने थे, कुछ योजनाएं थीं, कुछ इच्छाएं थीं, कोई लक्ष्य था।’ लेकिन अचानक ही किसी ने मुझे हिलाकर रख दिया मैंने पीछे देखा तो वो टीसी था। उसने कहा, आपका स्टेशन आ गया है कृपया नीचे उतर जाइए। मैं कन्फ्यूज हो गया। मैंने कहा नहीं अभी मेरी मंजिल नहीं आई है। उसने कहा- नहीं आपको अगले किसी भी स्टॉप पर उतरना होगा।
'इस डर और दर्द के बीच मैं अपने बेटे से कहता हूं, 'मैं किसी भी हालत में ठीक होना चाहता हूं। मुझे अपने पैरों पर वापस खड़े होना है। मुझे ये डर और दर्द नहीं चाहिए। कुछ हफ्तों के बाद मैं एक अस्पताल में भर्ती हो गया।
बेइंतहा दर्द हो रहा है। यह तो मालूम था कि दर्द होगा, लेकिन ऐसा दर्द... अब दर्द की तीव्रता समझ में आ रही है...कुछ भी काम नहीं कर रहा है। ना कोई सांत्वना और ना कोई दिलासा। पूरी कायनात उस दर्द के पल में सिमट आई थी... दर्द खुदा से भी बड़ा और विशाल महसूस हुआ।'
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मैं जिस अस्पताल में भर्ती हूँ, उसमें बालकनी भी है...बाहर का नज़ारा दिखता है. कोमा वार्ड ठीक मेरे ऊपर है.सड़क की एक तरफ मेरा अस्पताल है और दूसरी तरफ लॉर्ड्स स्टेडियम है ... वहां विवियन रिचर्ड्स का मुस्कुराता पोस्टर है.मेरे बचपन के ख्वाबों का मक्का,उसे देखने पर पहली नज़र में मुझे कोई एहसास ही नहीं हुआ...मानो वह दुनिया कभी मेरी थी ही नहीं.
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मैं दर्द की गिरफ्त में हूँ.
और फिर एक दिन यह अहसास हुआ...जैसे मैं किसी ऐसी चीज का हिस्सा नहीं हूँ,जो निश्चित होने का दावा करे ...ना अस्पताल और ना स्टेडियम.मेरे अंदर जो शेष था ,वह वास्तव में कायनात की असीम शक्ति और बुद्धि का प्रभाव था...मेरे अस्पताल का वहां होना था.मन ने कहा...केवल अनिश्चितता ही निश्चित है.
इस अहसास ने मुझे समर्पण और भरोसे के लिए तैयार किया ...अब चाहे जो भी नतीजा हो,यह चाहे जहाँ ले जाये,आज से आठ महीनों के बाद,या आज से चार महीनों के बाद...या फिर दो साल...चिंता दरकिनार हुई और फिर विलीन होने लगी और फिर मेरे दिमाग से जीने- मरने का हिसाब निकल गया
पहली बार मुझे शब्द ‘ आज़ादी‘ का एहसास हुआ सही अर्थ में ! एक उपलब्धि का अहसास. इस कायनात की करनी में मेरा विश्वास ही पूर्ण सत्य बन गया .उसके बाद लगा कि वह विश्वास मेरे हर सेल में पैठ गया.
वक़्त ही बताएगा कि वह ठहरता है कि नहीं...फ़िलहाल मैं यही महसूस कर रहा हूँ.
इस सफ़र में सारी दुनिया के लोग... सभी मेरे सेहतमंद होने की दुआ कर रहे हैं,प्रार्थना कर रहे हैं,मैं जिन्हें जानता हूँ और जिन्हें नहीं जानता,वे सभी अलग-अलग जगहों और टाइम जोन से मेरे लिए प्रार्थना कर रहे हैं.मुझे लगता है कि उनकी प्रार्थनाएं मिल कर एक हो गयी हैं,एक बड़ी शक्ति...तीव्र जीवन धारा बन कर मेरे स्पाइन से मुझ में प्रवेश कर सिर के ऊपर कपाल से अंकुरित हो रही हैं. अंकुरित होकर यह कभी कली,कभी पत्ती,कभी टहनी और कभी शाखा बन जाती है...मैं खुश होकर इन्हें देखता हूँ.लोगों की सामूहिक प्रार्थना से उपजी हर टहनी,हर पत्ती,हर फूल मुझे एक नई दुनिया दिखाती हैं
अहसास होता है कि ज़रूरी नहीं कि लहरों पर ढक्कन(कॉर्क) का नियंत्रण हो. जैसे आप क़ुदरत के पालने में झूल रहे हों !

